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'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है' गा हंसते-हंसते शहीद हो गए थे बिस्मिल

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महज 11 साल की उम्र में ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले शहीद राम प्रसाद बिस्मिल क्रांति और कलम से समान रिश्ता था. 11 जून 1897 को शाहजहांपुर में जन्में राम प्रसाद बिस्मिल बचपन से हि आर्यसमाज से प्रेरित थे और उसके बाद वे देश की आजादी के लिए काम करने लगे.

मातृवेदी संस्था से जुड़े बिस्मिलअंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई के लिए हथियार और जानकारी एकत्रित करते थे लेकिन एक दिन अंग्रेजों को उनकी जानकारी मिल गई जिसके बाद काकोरी कांड में उनको गिरफ्तार कर लिया गया.

काकोरी कांड में शामिल होने की वजह से अंग्रेजों ने राम प्रसाद बिस्मिल को 19 दिसंबर 1927 को फांसी के फंदे पर लटका दिया था. बिस्मिल कविताओं और शायरी लिखने के काफी शौकीन थे.

फांसी के तख्त पर देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने से ठीक पहले राम प्रसाद बिस्मिल ने खुशी खुशी क्या गाया-

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है

करता नहीं क्यूं दूसरा कुछ बातचीत,

देखता हूं मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है

ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,

अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमान,

हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है

खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,

आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

है लिये हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर,

और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर

खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है,

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ जिन में हो जुनूं कटते नही तलवार से,

सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से

और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है,

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पे कफ़न,

जान हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम

जिन्दगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल में है,

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

यूं खड़ा मक़तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार,

क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है

दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,

होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको ना आज

दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है,

वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून

तूफ़ानों स क्या लड़े जो कश्ती-ए-साहिल में है,

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

बिस्मिल की रचनाओं से चुनिंदा अंश-  

इलाही ख़ैर वो हरदम नई बेदाद करते हैँ

हमेँ तोहमत लगाते हैँ जो हम फरियाद करते हैँ

ये कह कहकर बसर की उम्र हमने क़ैदे उल्फत मेँ

वो अब आज़ाद करते हैँ वो अब आज़ाद करते हैँ

सितम ऐसा नहीँ देखा जफ़ा ऐसी नहीँ देखी

वो चुप रहने को कहते हैँ जो हम फरियाद करते हैँ

ऐ मातृभूमि तेरी जय हो, सदा विजय हो ।

प्रत्येक भक्त तेरा, सुख-शांति-कान्तिमय हो ।।

अज्ञान की निशा में, दुख से भरी दिशा में,

संसार के हृदय में तेरी प्रभा उदय हो ।

दिल फ़िदा करते हैं, कुर्बान जिगर करते हैं,

पास जो कुछ है, वो माता की नज़र करते हैं,

ख़ाना वीरान कहां, देखिए घर करते हैं,

अब रहा अहले-वतन, हम तो सफ़र करते हैं,

जा के आबाद करेंगे किसी विराने को !

दुनिया से गुलामी का मैं नाम मिटा दूंगा,

एक बार ज़माने को आज़ाद बना दूंगा।

बेचारे ग़रीबों से नफ़रत है जिन्हें, एक दिन,

मैं उनकी अमरी को मिट्टी में मिला दूंगा।

हिम्मत को ज़रा बांधो, डरते हो ग़रीबों क्यों?

शैतानी क़िले में अब मैं आग लगा दूंगा।

हे मातृभूमि ! तेरे चरणों में शिर नवाऊँ ।

मैं भक्ति भेंट अपनी, तेरी शरण में लाऊँ ।।

माथे पे तू हो चंदन, छाती पे तू हो माला ;

जिह्वा पे गीत तू हो मेरा, तेरा ही नाम गाऊँ ।।

दश की ख़ातिर मेरी दुनिया में यह ताबीर हो

हाथ में हो हथकड़ी, पैरों पड़ी ज़ंजीर हो

सर कटे, फाँसी मिले, या कोई भी तद्बीर हो

पेट में ख़ंजर दुधारा या जिगर में तीर हो

चर्चा अपने क़त्ल का अब दुश्मनों के दिल में है,

देखना है ये तमाशा कौन सी मंजिल में है ?

कौम पर कुर्बान होना सीख लो ऐ हिन्दियों !

ज़िन्दगी का राज़े-मुज्मिर खंजरे-क़ातिल में है !

न चाहूँ मान दुनिया में, न चाहूँ स्वर्ग को जाना

मुझे वर दे यही माता रहूँ भारत पे दीवाना

करूं मैं कौम की सेवा पड़े चाहे करोड़ों दुख

अगर फ़िर जन्म लूँ आकर तो भारत में ही हो आना

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