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मुहर्रम: आखिर क्‍यों इस दिन मनाया जाता है मातम?

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मुहर्रम इस्लामी वर्ष यानी हिजरी सन्‌ का पहला महीना होता है। हिजरी सन्‌ का आगाज इसी महीने से होता है। मुहर्रम जिसे आशूरा भी कहा जाता है, इस महीने के 10वे तारीख को मनाया जाता है। मुहर्रम आज यानि 10 सितम्बर को मनाया जा रहा है। यह खुशियों का त्‍योहार नहीं बल्‍कि मातम और आंसू बहाने का महीना माना जाता है।

इस माह को इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार किया जाता है। अल्लाह के रसूल हजरत ने इस मास को अल्लाह का महीना कहा है। यह इस्लामिक नए साल का पहला पर्व है। हज़रत मुहम्मद के साथी इब्ने अब्बास के मुताबिक हज़रत ने कहा कि जिसने मुहर्रम की 9 तारीख का रोजा रखा, उसके दो साल के गुनाह माफ हो जाते हैं तथा मुहर्रम के एक रोजे का फल 30 रोजों के बराबर मिलता है। पूरी दुनिया के मुस्लमान मुहर्रम के 9 और 10 तारीख को रोजा रखते है और वे अपने घरों या मस्जिद में इबादत करते है।

इस्‍लामी मान्‍यताओं के अनुसार इराक में यजीद नाम का जालिम बादशाह इंसानियत का दुश्मन था। यजीद खुद को खलीफा मानता था, लेकिन अल्‍लाह पर उसका कोई विश्‍वास नहीं था। वह चाहता था कि हज़रत इमाम हुसैन उसके खेमे में शामिल हो जाएं। लेकिन हुसैन को यह मंजूर नहीं था और उन्‍होंने यजीद के विरुद्ध जंग का ऐलान कर दिया था। पैगंबर-ए इस्‍लाम हजरत मोहम्‍मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन को कर्बला में परिवार और दोस्तों के साथ शहीद कर दिया गया था। जिस महीने हुसैन और उनके परिवार को शहीद किया गया था वह मुहर्रम का ही महीना था।

इमाम हुसैन अली रदियल्लाहु के दूसरे बेटे थे और पैग़म्बर मुहम्मद के नाती थे। इनका जन्म मक्का में हुआ था। इनकी माता का नाम फ़ातिमा ज़हरा था।

शिया समुदाय के लोग 10 मुहर्रम के दिन काले कपड़े पहनकर हुसैन और उनके परिवार की शहादत को याद करते हैं। हुसैन की शहादत को याद करते हुए सड़कों पर जुलूस निकाला जाता है और मातम मनाया जाता है। वहीं सुन्‍नी समुदाय के लोग मुहर्रम के महीने में 10 दिन तक रोजे रखते हैं।

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