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बहन-भाईयों के रिश्ते का प्रतीक भाईदूज

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दुनिया भर के रिश्ते-नातों से सबसे अच्छा और पवित्र भाई-बहन का रिश्ता माना जाता है। जहां थोड़ी बहुत नोक-झोक के साथ खूब सारा प्यार देखने को मिलता है, और इस रिश्ते को और मजबूत करने के लिए हिंदू धर्म में भाईदूज का पर्व मनाया जाता है। जोकि हर साल दीपावली से दो दिन बाद मनाया जाता है।
 
भाईदूज का शुभ मुहर्त
भाईदूज के शुभ मुहर्त की बात करें तो इस बार सूर्य ग्रहण लगने के कारण पर्वो की तारिखों में बदलाव हुआ है. भाईदूज का पर्व हर साल दीपावली से दो दिन बाद मनाया जाता है पंचांग के अनुसार कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की द्वितिया तिथि इस बार 26 अक्टूबर की दोपहर 2 बजकर 42 मिनट से शुरू होकर अगले दिन यानि 27 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 42 मिनट पर समाप्त होगी. तो वही उदय तिथि के अनुसार शुभ मुहर्त 27 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 42 मिनट से पहले तक का है।
 

भाईदूज को लेकर मान्यताएं
तो आईए जानते है, कि भाईदूज के त्योहार का हिंदूधर्म में क्या महत्व है, और इसको मनाने की कहानी के बारे में। पोराणिक मान्यताओं के अनुसार यमुना ने इसी दिन अपने भाई यमराज की लंबी उम्र के लिए व्रत किया था। उनके भाई यमराज ने इसी दिन उन्हे दर्शन दिये थे। जिसके बाद यमुना ने अपने भाई को अपने हाथों से भोग लगाया था। जब मृत्यु के देवता यमराज ने यमुना से वर मांगने को कहा। तो वर के रूप में यमुना ने वरदान मांगा कि समस्त भाई आज ही के दिन अपने बहनों के घर आएं। जिसको यमराज ने तथास्तु कहकर पूरा कर दिया। बस तभी से भाईदूज को मनाने का विधान है। 
 
भाईदूज को मनाने की विधि
सूर्यादय से पहले ही भाई-बहनों दोनो को ही स्नान करके नए कपड़े डालने चाहिए। उसके बाद सूर्या देवता को जल अर्पित करना चाहिए। इसके बाद बहनों को अपने भाई के टीकाकरण करना चाहिए। जिसके लिए फूल,चावल,मिठाई,कलावा,और सिंदूरी रंग का टीका सामग्री के तौर पर होना चाहिए। टीका लगाते समय भाईयों को उत्तर या पूर्व दिशा में खड़े करना चाहिए, और भाईयों का सिर पर रूमाल या कोई भी कपड़ा जरूर रखना चाहिए। टीका लगाने के लिए बहनों को दाएं हाथ का ही प्रयोग करना चाहिए। अंत में भाईयों को अपने बहनों का पैर छूकर कोई उपहार देना चाहिए। इसी के साथ दोनो बहन-भाईयों का यमुना नदी पर स्नान करना भी बेहद शुभ माना जाता है।

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