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IFFI 2022: बाल फिल्मों के जरिए बाल अधिकारों के विषय में बढ़ेगी जागरूकता: अनुराग ठाकुर

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पणजी (गोवा): गोवा में फिल्म महोत्सव चल रहा है लेकिन कोई भी महोत्सव भला बच्चों के अधिकारों, बच्चों से जुड़े फिल्मों के प्रदर्शन के बिना कैसे पूरा हो सकता है। यही कारण है कि यूनिसेफ और राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) गोवा में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) के 53वें संस्करण में बाल अधिकारों के दृष्टिकोण से बनी फिल्मों को प्रदर्शित करने और उसे बढ़ावा देने के लिए साथ मिलकर आगे बढ़ने का निर्णय लिया है।
 
बड़ी बात यह है कि  आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में ऐसा पहली बार हो रहा है अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में बच्चों और किशोरों के मुद्दों और उनसे जुड़े अधिकारो को उजागर करने और चर्चा के केंद्र में लाने के लिए ऐसी फिल्मों के लिए एक विशेष खंड बनाया गया है। फेस्टिवल में एनएफडीसी और यूनिसेफ द्वारा संयुक्त रूप से क्यूरेट की गई छह फिल्मों की स्क्रीनिंग की जाएगी।.
 
 
इस बाबत एक परिचर्चा का भी आयोजन किया जिसमें  जाने-माने निर्माता निर्देशकों ने भागीदारी की और आईएफएफआई में नॉलेज सीरीज़ - 'बच्चों की फिल्मों को मुख्यधारा के दर्शकों की संख्या में लाना' के हिस्से व्यापक विमर्श किया। 
इस परिचर्चा में केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर के साथ ही यूनिसेफ इंडिया के चीफ ऑफ कम्युनिकेशन, एडवोकेसी एंड पार्टनरशिप, ज़ाफरीन चौधरी,केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी, जाने-माने फिल्म निर्माता मनीष मुंद्रा और जितेंद्र मिश्रा शामिल हुए। परिचर्चा का संचालन जाने-माने क्यूरेटर और रचनात्मक निर्माता मोनिका वाही ने किया। यह परिचर्चा रचनात्मक स्क्रिप्ट और कहानियों, वित्तपोषण, वितरण के साथ ही बचपन और साहस का जश्न मनाने वाली फिल्मों के लिए एक मांग और व्यापक दर्शकों आदि पर चर्चा की गई जिसके केंद्र में  बच्चों का दृढ़ संकल्प और लचीलापन, उनके सामने आने वाले मुद्दों और चुनौतियों को उजागर करना आदि विषय भी प्रमुखता से उठाया गया। 
 
'75 क्रिएटिव माइंड्स फॉर टुमॉरो' कार्यक्रम - सूचना और प्रसारण मंत्रालय की एक पहल, यूनिसेफ द्वारा समर्थित और आईएफएफआई के दौरान पेश किया गया, युवा प्रतिभाओं को 'इंडिया @ 100' विषय पर 53 घंटे की फिल्म निर्माण चुनौती में खुद को अभिव्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
 
क्या कहा केंद्रीय मंत्री ने
 
इस कार्यक्रम में, केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा, जैसा कि हम अमृत काल में प्रवेश करते हैं और भारत की स्वतंत्रता के 100 वें वर्ष की ओर अग्रसर होते हैं, हम मानते हैं कि बच्चे राष्ट्र का भविष्य हैं।  किसी भी समाज की वृद्धि और समृद्धि के लिए बच्चों का स्वस्थ विकास महत्वपूर्ण है।
 
उन्होंने कहा, फिल्मों के माध्यम से बाल अधिकारों को बढ़ावा देने की दृष्टि से, आईएफएफआई का 53वां संस्करण विशेष रूप से हमारे युवा दर्शकों के लिए बनाई गई छह फिल्मों को प्रदर्शित कर रहा है। ये फिल्में बच्चों के सामने आने वाले वास्तविक मुद्दों को दर्शाती हैं और बच्चों के अधिकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाती हैं। ये फिल्में बचपन और उसके सामाजिक-आर्थिक संदर्भों को आकार देने वाली गतिशील ताकतों पर भी प्रतिबिंबित होगा।
 
यूनिसेफ इंडिया के चीफ ऑफ कम्युनिकेशन एंड एडवोकेसी, ज़ाफरीन चौधरी ने कहा, हम दिल को छू लेने वाली फिल्में दिखाने के लिए एक मंच के रूप में आईएफएफआई में एक कारण भागीदार बनकर खुश हैं, जो बच्चों और युवाओं की आवाज़, उनके दृष्टिकोण, उनकी चुनौतियों के साथ-साथ उनके लचीलेपन को भी दर्शाता है। इनमें से प्रत्येक फिल्म लाखों लोगों को प्रेरित कर सकती है।
 
महोत्सव में दिखाई जा रही हैं ये छह फिल्में
 
पूरे सप्ताह चलने वाले इस अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के दौरान, यूनिसेफ और एनएफडीसी की साझेदारी में इस साल फेस्टिवल में दिखाई जाने वाली फिल्मों की बात करें तो कुल छह फिल्में हैं। इनमें लेबनानी फिल्म 'कैपरनम', हिंदी फिल्में 'धनक' (मूल शीर्षक रेनबो), 'उड़ जा नन्हे दिल', 'सुमी' और 'नानी तेरे मोरनी', एक बंगाली फिल्म 'टू फ्रेंड्स' (मूल शीर्षक दोस्तोजी) शामिल हैं। लेबनान में नादिन लाबाकी द्वारा निर्देशित कफरनहूम एक क्षतिग्रस्त बचपन, शरणार्थियों और समाज में दरार के बारे में एक चलती कहानी है जिसने मानवता से मुंह मोड़ लिया है।
नागेश कुकुनूर द्वारा रचित धनक (मूल शीर्षक रेनबो) एक बच्चे की अपने नेत्रहीन भाई का इलाज कराने की यात्रा को दर्शाती है।
आकाशादित्य लामा द्वारा लिखित नानी तेरे मोरनी एक बच्चे की सच्ची कहानी पर आधारित है जिसने डर पर काबू पाया और अपनी दादी को डूबने से बचाया।
 
सुमी, अमोल गोले द्वारा निर्देशित, एक 12 वर्षीय वंचित लड़की के बारे में एक उत्साहित और प्रेरक कहानी है, जो अपने गांव से कई मील दूर अपनी साइकिल से स्कूल जाने का सपना देखती है।
टू फ्रेंड्स (मूल शीर्षक दोस्तोजी) प्रसून चटर्जी द्वारा निर्देशित एक बंगाली फिल्म है जिसमें आठ साल की उम्र के दो बच्चों की दोस्ती को दर्शाया गया है जब एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद धार्मिक विभाजन अपने चरम पर था।
स्वरूपराज मेडारा द्वारा निर्देशित उड़ जा नन्हे दिल, एक ऐसे बच्चे के बारे में है जो एक गरीब परिवार से आने के बावजूद एक समृद्ध स्कूल में जाने के बाद उसके साथ कैसा व्यवहार करेगा, इस बारे में अनिश्चित है।

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