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देश भीतर देस की बहस बरास्ते वर्दी और कलम -चोला माटी के राम - अनसुने लड़ाको का अंतहीन युद्ध

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 डॉ. एम. के. पाण्डेय 

किसी कृति की कथा को समय रचते समय कहानीकार अथवा उपन्यासकार अमूमन कुछ खास किस्म के मानसिक अंतर्द्वंद से गुजरता है। प्लॉट प्रख्यात रखें, मिश्रित रखे या कि कोरा यथार्थ। कोरा यथार्थ कहानी में हमेशा नहीं तो कई दफे नीरसता ओढ़ लेती है। यानी उसके कथाविन्यास में रोचकता का रंच मात्र भी लोप उस कृति को पाठक के लिए बोझिल कर सकती है। इसके उलट अगर लेखक को अपनी कलम, कल्पनाशीलता और वैचारिकी में भरोसा है तो चोला माटी के राम बनकर सामने आता है। यह छोटे कलेवर का उपन्यास है। उपन्यासकार पेशे से पुलिसिया सेवा में उच्च पद पर हैं पर साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने इसके पहले 'बैरिकेड' नामक उपन्यास लिखकर अपनी सार्थक मौजूदगी का अहसास पहले ही करा दिया है। इस बार वह चोला माटी ... के साथ आये है। यह छत्तीसगढ़ का एक पारम्पारिक निर्गुण दार्शनिक गीत है। इसे छत्तीसगढ़ के संस्कृतिपुरुष नाटककार हबीब तनवीर ने अपने नाटक 'बहादुर कलारिन' में प्रयोग किया था फिर बाद में फिल्मकार अनुषा रिजवी ने अपनी चर्चित फिल्म पीपली लाइव में भरतवाक्य की तरह इस गीत का प्रयोग किया था उपन्यासकार अभिषेक सिंह इस गीत को एक जीवन दर्शन के तौर पर ही लेते हैं और उसी अंदाज में छत्तीसगढ़ के गांव सैंड्रा और उसके आसपास के इलाकों के साथ उपन्यास में भरतवाक्य की तरह जाने अनजाने पेश भी करते हैं। 'चोला माटी का राम', सामान्य उपन्यास की तरह नहीं पढ़ा जा सकता ना लेखक ने उसकी कोशिश की है। वह बस्तर में स्थित होकर देश दुनिया, शिक्षण संस्थानों, दिल्ली, राजनीति, युवा, नक्सल, पुलिस, वनवासी समुदाय के तमाम तर्कों को बहस की शक्ल देता है। इसके अतिरिक्त क्रांति की कथा पर प्रकाश डालते क्रान्ति के भीतर की राजनीति की बखिया भी अभिषेक उधेड़ देते हैं। कई दफे इस क्रम में लेखक फिल्मी होता जान पड़ता है पर वही इसकी ख़ासियत बन जाती है क्योंकि इससे कथा के दृश्यों का रचाव बढ़िया हो जाता है और संवादों के मार्फत कथा सुंदर और रोचक होकर आगे बढ़ती है। कहने को कथा नायक साकेत है जो अमेरिका के पीट्सबर्ग यूनिवर्सिटी और जेएनयू से पढ़कर बस्तर आया हुआ है। उसकी पार्टनर कनिष्का और साकेत का इंट्रो देता लेखक लिखता है "साकेत जहां हमेशा कुछ नया कुछ क्रांतिकारी करने का सोचता, वही कनिष्का पुराने में सुधार कर कुछ अच्छा निकालने की जुगत करती।
 
 
साकेत को इतिहास सिर्फ इसलिए पसंद था कि वह उससे सीख ले और भविष्य में क्रांति ला सके और कनिष्का को इतिहास इसलिए पसंद था, जिससे सीखकर वह गलतियां ना की जाए जो इतिहास में हुई थी"। जेएनयू के खिलाफ इन दिनों जो माहौल बनाया गया है उसकी बहसों का एक सिरा लेखक ने यहाँ भी पकड़ा है " जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय अपने आप में बुद्धिजीवियों की खान है। यूं तो देश के हर कोने से छात्र यहां पढ़ने आते हैं पर बहुतेरे अपने इलाके के टॉपर्स भी यहां कर फुस्स हो जाए तो हैरानी नहीं होती। यहां ऐसा माहौल होता है कि वामपंथी विचारधारा के छात्र अधिक पाए जाते हैं। यहां के शिक्षक भी वामपंथ से काफी प्रभावित मिलते हैं। कई बार चर्चाओं वाद-विवादों का ऐसा दौर चलता है, जो दो-तीन दिन तक नहीं रुकता। दक्षिणपंथी भी वामपंथ से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते लेकिन इन सब के इधर जेएनयू देश की सबसे बेहतरीन यूनिवर्सिटीज में से एक है।"- यह अंतिम पंक्ति एक संस्थान जिस पर हर दूसरा पत्थर उछालने पर लगा हो, उसके लिए रचनात्मक ढाल बनकर खड़ा हो जाता है और यही पर लेखक की कलम सरकारी होने से चतुराई से बच जाती है। जबकि इसी के दूसरे हिस्से में वह सतहत्तर जवानों के शहीद होने पर जेएनयू में जश्न मनाने पर शिकायती भी होता है। लेखक इस हिस्से में आते आते रामखिलावन के किरदार में खुद उतरता दिखता है बहरहाल, इन सबके बावजूद खास यह है कि लेखक का पुलिस मन पुलिसिया एक्शन्स को भी जस्टिफाय करता नहीं दिखता वह इसके भीतर के ख़मोपेंच भी बताता है। इसलिए सलवाजुड़ुम के बहाने बस्तर के भीतर नक्सल समस्या और उसके विरोधाभास वाले दृश्य उपन्यास के महत्वपूर्ण हिस्से है। यह अधिक यथार्थवादी लगती है। शायद इसकी एक वजह यह भी है कि अपनी पुलिसिया नौकरी के दौरान लेखक ने इस इलाके के भीतरी हिस्सों में कई ऑपरेशंस को अंजाम दिया है अथवा उसके साथ रहे हैं। यह अनुभवजन्य है। सच कहें तो 'चोला माटी के राम' का सत्य सिरजा हुआ सत्य नहीं है बल्कि अनुभव के बीहड़ों से गुजरता हुआ पाठक के सामने आता है। इस अनुभव की महत्ता को उपन्यास का एक जरुरी पुलिसिया पात्र रामखेलावन चौबे बताता है "अनुभव का कोई स्थानापन्न नहीं होता बेटा! अनुभव ज्ञान से ऊपर होता है किताबी ज्ञान जरूरी है लेकिन अनुभव बहुत ज्यादा जरूरी है। तुमने अच्छा किया कि रिसर्च करने यहां चले आए। कई लोग तो यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में बैठकर वहां की किताबों से बस्तर पर रिसर्च कराते हैं।"- इस संवाद में लेखक एक तीर से कई निशाने साधते दिखता है। बस्तर पर हवा-हवाई और बिना पक्षपाती हुए सरकारी और एनजीओनुमा लिखत की बाढ़ भी बीते वर्षों में खूब आई है, उस पर यह अकेला संवाद भारी पड़ता है। वैसे भी बस्तर और उसके जनजीवन के बारे में मुख्यधारा की जमीन पर बसे आम और खास लोगों ने कान से अधिक देखा है बजाए आँखों के। उपन्यासकार ने बड़े ही नाटकीय अंदाज में इस उपन्यास के संवाद रचकर भीतर वाले बाहर वाले, सत्ता और विपक्ष, आदिवासी और अतिवादी, हथियार और कलम के हिस्से का भी सच लिखा है। कथा नायक अपने रिसर्च के बारे में बताते हुए एक जगह कहता है कि वह नक्सलियों के मकसद, कार्यशैली, फंडिंग, ट्रेनिंग, एनकाउंटर आदि पर काम कर रहा है  तब सामने बैठा अनुभवी किरदार जो महज आठवीं जमात पास होकर पुलिस में बहाल हुआ है, पूछता है- "यह बताओ क्या है?- चौबे ने उंगलियों से जमीन पर छ: लिख दिया। 
 
जी नौ है !- साकेत सकुचाते हुए बोला 
मेरी तरफ से तो छ: दिख रहा है - चौबे मुस्कुरा दिया ।
साकेत कुछ ना बोला ।
 
जो तुम्हें दिखे वही सत्य नहीं है। सामने वाले को क्या दिख रहा है या सामने वाला उसे किस नजरिए से देख रहा है, यह भी जरूरी है।"- 
लेकिन चोला माटी के राम केवल राजनीति, नक्सल, पुलिस, एम्बुश, कंपनियों पूंजीपतियों की राजनीति तक महदूद नहीं रहता वह सामाजिक विसंगतियों पर खुलकर हमला करता है। शराब अच्छी या बुरी, मांसाहार क्यों और क्यों नहीं, जनेऊ क्यों, संस्कार, बिल गेट्स, हम्मूराबी मंडेला तक जाकर यह सामाजिक भेदभाव पर प्रश्न उठता इस बात का पक्षकार बनता है कि "दर्द और प्रेम की भाषा सार्वभौमिक होती है। उसे कोई माध्यम नहीं चाहिए होता है।"- विरोधी विचारों के बहसों वाला उपन्यास कई बार दो या तीन  किरदारों  के तर्क-वितर्क में आगे बढ़ता है और पाठक इसके साथ अपने सवाल जवाब लेने-देने लगता है। इन सब भेदों पर लेखक ने बड़ी कूटनीतिक चतुराई से सरकारी वर्दी पर बात करते लाल रंग के वैचारिकी में जैसे ही घुसते दिखता है वह अगले ही पल नीर क्षीर विवेक लेकर सामने खड़ा हो जाता है। असल में यह केवल बस्तर के एक गाँव या उसकी गतिविधियों पर सिरजा काल्पनिक उपन्यास नहीं रह जाता बल्कि लेखक का किरदार इन स्थितियों में कभी न कभी उपस्थित रहा है इसलिए इनका साहचर्य बतकही और दृश्यों में असल बनकर निकलता है। यद्यपि औपन्यासिक शिल्प के रूप में इस उपन्यास थोड़ा कमजोर है पर कथा इतनी मजबूत है कि दर्शक कथ्य से जुड़ जाता है फिर शिल्प और अन्य तात्विक बातें हवा-हवाई हो जाती है। इसकी कथा यथार्थ का कलेवर ओढ़े और रचनात्मकता की अनुभवी छौंक लिए हुए है। कहना न होगा कि अभिषेक की लेखनी की परिपक्वता साफ दिखती है वैसे भी यह उपन्यास देश भीतर देस की बहस बरास्ते वर्दी और कलम पेश करती है। मानव होने के बुनियादी मूल्य और नैतिकता के साहस की कहानी भी है यह कथा। इस उपन्यास को इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि बस्तर इसी देश का हिस्सा है जहाँ कई आँखें हैं उम्मीदों की, जहाँ एक हृदय है, लाखों कोकिल कंठ, प्रकृति का नृत्य और गायन है जिनमें देशराग बजता है, लेखक की इस इलाके में बंदूक लेकर इलाके में इंट्री हुई थी और जब वह लौटा है उसके हिस्से कलम है। जिसने विरुद्धों के मध्य प्रेम सिरजा है, असंगत के बीच संगवारी की है और यह उसने बिना हो हल्ले के किया है क्योंकि हो अच्छी रचनाएं और अच्छे लेखक होते हैं, धीमे स्वर में बोलते हैं। यह उसी श्रेणी की रचना है, जिसका हर किरदार पाठक की संवेदना अपने साथ ले जाता है और इस प्रकृतिलोक का आज का दृश्य बिना किसी को अतिशय दोष दिए एक अफसोस देता है पर भविष्य का सुन्दर स्वप्न देता है। आखिर अपने तो देखने ही होंगे क्योंकि वही तो उस फीनिक्स की तरह है जो अपनी ही राख से बार बार पैदा होता है।
(ले​खक दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज के हिंदी विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं।)

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