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भारतीय भाषाओं पर बड़ा संकट, 197 भाषाएं विलुप्त होने की कगार पर

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पूरी दुनिया ने शुक्रवार को देसी भाषाओं का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया गया. भाषा किसी भी देश की संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग होती है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विलुप्त होती जा रही भाषाओं को लेकर जागरूकता फैलाने के प्रयास आवश्यक हैं. दुनिया भर में लगभग 7,000 भाषाएं हैं.
 
भारत में इस समय करीब 450 जीवित भाषाएं हैं. देश की यह समृद्ध भाषाई विरासत गर्व की अनुभूति करने लायक है. लेकिन चिंता का विषय यह है कि भारत की 10 भाषाएं ऐसी हैं जिसकी जानकारी 100 से भी कम लोग को ही है. इन भाषाओं में अधिकतर भाषाएं वहां के मूल निवासियों द्वारा बोली जाती हैं, लेकिन ये भाषाएं खतरनाक रूप से विलुप्त होती जा रही हैं.
 
वहीं भारत की 81 भाषाओं की स्थिति भी कुछ ख़ास नहीं है. जिसमें मणिपुरी, शेरपा, बोडो, गढ़वाली, लद्दाखी, मिजो और स्पिति शामिल हैं. लेकिन यह सभी भाषाएं अभी 'कमजोर' की श्रेणी में आती हैं. इनको बचाए रखने के लिए संगठित कोशिश करने की आवश्यकता है.
 
दुनिया की संकट में पड़ी भाषाओं के यूनेस्को एटलस के ऑनलाइन चैप्टर के अनुसार 197 भारतीय भाषाएं ऐसी हैं जो संकट, असुरक्षित, लुप्तप्राय या विलुप्त हो चुकी हैं.
 
विलुप्त हो रही भाषाओं में तोलचा, अहोम, एंड्रो, रंगकास, सेंगमई व अन्य भाषाएँ भी शामिल हैं. ये सभी भाषाएं हिमालयन बेल्ट में बोलीं जाती हैं.
 
यूनेस्को के अनुसार दुनिया की तकरीबन 97 प्रतिशत आबादी इनमें से सिर्फ 4 प्रतिशत भाषाओं के जानकार है, जबकि दुनिया के सिर्फ 3 प्रतिशत लोग ही ऐसे है जो बाकी के 96 प्रतिशत भाषाओं की जानकारी रखते हैं.
 
मूल निवासियों द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली हजारों भाषाएं विलुप्त होने की स्थिति में हैं. देसी भाषाओं के अंतर्राष्ट्रीय दिवस यानी इंटरनेशनल ईयर ऑफ इंडिजीनियस लैंग्वेज (आईवाईआईएल) पर विशेषज्ञों ने बताया कि हमें सदियों पुरानी भाषाओं को विलुप्त होने से रोकने की आवश्यकता है और इसके लिए लोगों को जागरूक करना होगा. 

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