Surya Samachar
add image

Uttarakhand Joshimath History: ये रहा जोशीमठ का 1500 साल पुराना इतिहास, जानकर आप भी हो जाएंगे हैरान

news-details

Uttarakhand Joshimath History: धार्मिक और सांस्कृतिक अहमियत वाले शहर जोशीमठ को बद्रीनाथ का द्वार माना जाता है और इसका इतिहास करीब 1500साल पुराना है। 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य को यहीं ज्ञान प्राप्त हुआ और चार मठों में से पहले मठ की स्थापना उन्होंने जोशीमठ में ही की थी।

देवभूमि उत्तराखंड के प्रमुख नगरों में से एक नगर है। जोशीमठ जिसे ज्योतिमठ के नाम से भी जाना जाता है। शंकराचार्य द्वारा इस शहर की स्थापणा की गयी थीIशंकराचार्य के जीवन के धार्मिक वर्णन के अनुसार भी ज्ञात होता है कि उन्होंने अपने चार विद्यापीठों में से एक की स्थापना की और इसे ज्योतिर्मठ का नाम दिया, जहां उन्होंने अपने शिष्य टोटका को यह गद्दी सौंप दी।

यह स्थान कामप्रयाग क्षेत्र में स्थित है जहां नदी धौलीगंगा और अलखनंदा का संगम होता है। जोशीमठ का पौराणिक संबंध भी है माना जाता है कि प्रारंभ में जोशीमठ का क्षेत्र समुद्र में था और जब यहां पहाड़ उदित हुए तो वह नरसिंहरूपी भगवान विष्णु की तपोभूमि बनी।

किवदंती में दानव हिरण्यकश्यप तथा उसके पुत्र प्रह्लाद की कथा है। हिरण्यकश्यप को वरदान प्राप्त था कि किसी स्त्री या पुरूष, दिन या रात, घर के अंदर या बाहर या तथा किसी शस्त्र या अस्त्र के प्रहार द्वारा उसे मारा नहीं जा सकेगा। इसी कारण वह अहंकारी बना और वह स्वयं को भगवान मानने लगा। उसने अपने राज्य में विष्णु की पूजा को वर्जित कर दिया।

भक्त प्रह्लाद, भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था इसीलिए अपने पिता द्वारा दी गई यातनाओं के बावजूद वह विष्णु की पूजा करता रहा। क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर प्रज्ज्वलित अग्नि में चली जाय क्योंकि होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी।

जब होलिका प्रह्लाद को लेकर अग्नि में गई तो भक्त प्रह्लाद को कुछ भी नही हुआ और होलिका जलकर राख हो गयी। अंतिम प्रयास में हिरण्यकश्यप ने एक लोहे के खंभे को गर्म कर लाल कर दिया तथा प्रह्लाद को उसे गले लगाने को कहा। एक बार फिर भगवान विष्णु प्रह्लाद को उबारने आ गए। खंभे से भगवान विष्णु नरसिंह के रूप में प्रकट हुए तथा हिरण्यकश्यप को चौखट पर, गोधुलि बेला में आधा मनुष्य, आधा जानवर (नरसिंह) के रूप में अपने पंजों से मार डाला।

 

कहा जाता है कि इस अवसर पर नरसिंह का क्रोध इतना प्रबल था कि हिरण्यकश्यप को मार डालने के बाद भी कई दिनों तक वे क्रोधित रहे। अंत में, भगवती लक्ष्मी ने प्रह्लाद से सहायता मांगी और वह तब तक भगवान विष्णु का जप करता रहा जब तक कि वे शांत न हो गए। आज उन्हें जोशीमठ के सर्वोत्तम मंदिर में शांत स्वरूप में देखा जा सकता है। नरसिंह मंदिर से संबद्ध एक अन्य रहस्य का वर्णन स्कंद पुराण के केदारखंड में है।

इसके अनुसार, शालीग्राम की कलाई दिन पर दिन पतली होती जा रही है। जब यह शरीर से अलग होकर गिर जायेगी तब नर एवं नारायण पर्वतों के टकराने से बद्रीनाथ के सारे रास्ते हमेशा के लिये बंद हो जायेंगे। भगवान विष्णु की पूजा भविष्य बद्री में होगी जो तपोवन से एक किलोमीटर दूर जोशीमठ के निकट है।

जानकारी के लिए बता दे कि, जोशीमठ ही वह स्थान है जहां ज्ञान प्राप्त करने से पहले आदि शंकराचार्य ने शहतूत के पेड़ के नीचे तप किया था। यह कल्पवृक्ष जोशीमठ के पुराने शहर में स्थित है और वर्षभर सैकड़ों उपासक यहां आते रहते हैं। इस वृक्ष के नीचे भगवान ज्योतिश्वर महादेव विराजमान है जिनके मंदिर के एक भाग में आदि जगतगुरू शंकराचार्य जी द्वारा जलाई गयी। ऐसी मान्यता है कि इस ज्योति के दर्शन मात्र से मानव जीवन का पाप समाप्त हो जाता है।

इस पावन ज्योति के साथ स्थल का दर्शन करने से मानव को एक कल्प यज्ञ का फल प्राप्त होता है। बद्रीनाथ के विपरीत जोशीमठ प्रथम धाम या मठ है जिसे शंकराचार्य ने स्थापित किया, जब वे सनातन धर्म के सुधार के लिये निकले।

 

You can share this post!