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तैयार रहे भूकंप से निपटने के लिए

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रविवार की रात अंडमान - निकोबार भूकंप से दहल गया. अंडमान निकोबार में सोमवार सुबह तक भूकंप के 18 झटकों से धरती कांप उठी. रिएक्टर पैमाने पर भूकंप की तीव्रता 4.8 मांपी गई. 2001 में गुजरात के भुज में बड़ा भूकंप आया था. इस आपदा में 20, 000 लोगों की मौत हो गई थी, और कई  गांव के गांव जमींदोज हो गए थे. देश में निम्न शहरों को भूंकपीय जोन के चार या पांच की स्केल में रखा गया है. अर्थात, भूकंप की दृष्टि से बहुत ही अधिक संवेदनशील क्षेत्र - दिल्ली, पटना, श्रीनगर, कोहिमा, पुडुचेरी, गुवाहाटी, गंगटोक, शिमला, देहरादून, इम्फाल, चण्डीगढ आदि.

भूकंप आता कैसे है अब जरा इसे समझने का प्रयास करते है- धरती चार परतों से बनी है- इनरकोर, आउटरकोर, मेंटल और क्रस्ट , क्रस्ट और ऊपरी मेंटल को लीथोस्फेयर कहा जाता है. लीथोस्फेयर 50 किलोमीटर की परत होती है. ये परत कई भागों में बंटी होती है. इन्हे टेक्टोनिकल प्लेट्स कहते है. जब इन टेक्टोनिकल प्लेट्स में हलचल तेजी से होती है तो भूकंप आता है. भू वैज्ञानिकों का मानना है कि भूकंप के केंद्र की गहराई जितनी कम होती है तबाही उतनी ज्यादा होती है. नेपाल में आये हाल के भूकंप की गहराई केवल 10 किलोमीटर थी इसीलिए वहां तबाही व विनाश भी ज्यादा हुआ.

इंग्लैंड के जियोलॉजिकल सर्वे के डॉ. ब्रायन बैप्टी का कहना है कि भारतीय उपमहाद्वीप उतर की तरफ खिसक रहा है. और यूरेसिया के इलाके से टकरा रहा है. इस कारण हिमालय पर्वत और तिब्बत के पठार ऊपर उठ रहे हैं. इस कारण जमीन के भीतर उथल पुथल हो रही है.

वैज्ञानिक अभी तक भूकंप को रोकने या इसके आने की पूर्व सूचना देने के बारे में कोई पुख्ता व आधिकारिक तंत्र विकसित नहीं कर पाए है. ऐसे स्थिति में राज्यों, केंद्र सरकार व आम नागरिकों को यह दायित्व बन जाता है कि इस प्राकृतिक आपदा से कैसे निपटा जाए. इसके लिए गंभीरता से मंथन किया जाय केंद्र व राज्य सरकारों को इस आपदा से निपटने के लिए रेपिड ऐक्शन फोर्स का गठन कर उसके कार्यकर्ताओं को गहन प्रशिक्षण देना चाहिए, उन्हें ऐसे उपकरण व संसाधन उपलब्ध करवाय जाय जो की किसी भी स्थिति में निपटने के लिए उनके लिए कारगर साबित हो. स्कूल, कॉलेजों के बच्चों, युवाओं कार्यालओं में कार्यरत कर्मचारियों को नियमित रूप से प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि भूकंप आने की स्थिति में उन्हें कब क्या करना चाहिए, किस तरह अपनी सुरक्षा करते हुए दूसरों की सहायता की जा सकती है. इससे बेवजह की आपाधापी नहीं होगी और हर व्यक्ति साहस और संयम से इस स्थिति से निपट सके.

जापान जैसे देश में भूकंप नियमित रूप से आते है तो वहां के नागरिक हर वक्त इस स्थिति से निपटने के लिए मानसिक व शारीरिक रूप से तैयार रहते हैं. वहां के मकान व्यावसायिक प्रतिष्ठान इस तरह से डिजाइन कर बनाये जाते है कि भूकंप आने पर कम से कम क्षति हो. हमें ''आग लगने पर कुंआ खोदना'' की स्थिति से बचना है. तो तैयारी तो अभी से कर इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाना होगा। तभी हम हर परिस्थितियों में सुरक्षित रह पाएंगे।

मनमोहन रामावत 


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